कभी नक्सल हिंसा की सुर्खियों में रहे इलाकों में पहुंचे इंफ्लुएंसर्स, पूर्व नक्सलियों से संवाद से लेकर पूवर्ती में हिड़मा के परिवार से मुलाकात तक—13 घंटे की यात्रा में जाना बस्तर का अतीत और वर्तमान
जगदलपुर, 1 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ के बस्तर की बदलती तस्वीर को करीब से समझने के लिए दिल्ली से पहुंचे 43 इंफ्लुएंसर्स ने अपने भ्रमण के दूसरे दिन सुकमा से जगरगुंडा, केरलापेंदा होते हुए पूवर्ती तक करीब 13 घंटे से अधिक लंबी यात्रा की। यह सफर केवल पर्यटन नहीं, बल्कि उस बस्तर को करीब से जानने का प्रयास रहा, जिसकी पहचान लंबे समय तक देशभर में नक्सल हिंसा की खबरों से जुड़ी रही।
इस दौरान इंफ्लुएंसर्स ने पुनर्वास केंद्र में मुख्यधारा में लौट चुके पूर्व नक्सलियों से संवाद किया, पुलिस अधिकारियों से सुरक्षा और विकास की स्थिति समझी, कभी 'खूनी सड़क' के नाम से चर्चित मार्ग से गुजरते हुए नक्सल हिंसा के दौर की जानकारी ली और वर्ष 2010 के ताड़मेटला हमले में शहीद हुए 76 सीआरपीएफ जवानों से जुड़े क्षेत्र को देखा। इसके बाद उन्होंने ग्रामीणों से बातचीत की, करीब 21 वर्षों तक बंद रहे श्रीराम मंदिर में दर्शन किए और देर रात नक्सली कमांडर हिड़मा के पैतृक गांव पूवर्ती पहुंचकर उसके परिवार से मुलाकात की।
पूर्व नक्सलियों से जाना मुख्यधारा में लौटने का सफर
सुकमा पहुंचने के बाद दल ने सबसे पहले पुनर्वास केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने आत्मसमर्पण कर हिंसा का रास्ता छोड़ चुके पूर्व नक्सलियों से सीधे संवाद किया। इंफ्लुएंसर्स ने उनके जीवन, आत्मसमर्पण के बाद आए बदलाव और सामान्य जीवन में लौटने के अनुभवों को समझने का प्रयास किया।
इसके बाद दल ने सुकमा के पुलिस अधीक्षक से मुलाकात कर क्षेत्र में सुरक्षा, शांति, विकास और प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने से जुड़े प्रयासों की जानकारी ली। चर्चा के दौरान दूरस्थ इलाकों में सुरक्षा के साथ नागरिक सुविधाओं और विकास कार्यों की पहुंच को लेकर भी जानकारी साझा की गई।
साइंस पार्क ने दिखाई बस्तर की एक और तस्वीर
सुकमा में ही इंफ्लुएंसर्स ने साइंस पार्क का भ्रमण किया। जंगल और संघर्ष की पारंपरिक छवि से अलग यह पड़ाव बस्तर में शिक्षा, विज्ञान और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार की तस्वीर सामने रखने वाला रहा।
इसके बाद दल तोंगपाल होते हुए जगरगुंडा की ओर रवाना हुआ।
'खूनी सड़क' से गुजरे, ताड़मेटला की शहादत को जाना
जगरगुंडा की ओर बढ़ते हुए दल ने उस मार्ग से यात्रा की, जिसे कभी स्थानीय स्तर पर 'खूनी सड़क' के नाम से जाना जाता था। इस दौरान उन्हें उस दौर की जानकारी दी गई, जब यह इलाका नक्सली हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों का प्रमुख केंद्र रहा।
जगरगुंडा पहुंचकर इंफ्लुएंसर्स ने वर्ष 2010 के ताड़मेटला हमले से जुड़े क्षेत्र के बारे में जानकारी ली। 6 अप्रैल 2010 को हुए इस हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों की शहादत हुई थी।
जिन इलाकों के नाम कभी देशभर में हिंसा की खबरों के साथ सामने आते थे, उन्हीं स्थानों पर पहुंचकर वहां के अतीत को समझना इंफ्लुएंसर्स के लिए बस्तर को एक अलग नजरिए से देखने का अनुभव रहा।
21 साल बाद फिर गूंजी श्रीराम मंदिर में पूजा की घंटियां
जगरगुंडा से आगे दल केरलापेंदा पहुंचा। यहां करीब 21 वर्षों तक बंद रहे श्रीराम मंदिर ने इंफ्लुएंसर्स का ध्यान आकर्षित किया।
मंदिर में भगवान श्रीराम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित हैं। वर्ष 2003 में माओवादी प्रभाव के दौर में ग्रामीणों को मंदिर बंद रखने और पूजा-अर्चना नहीं करने का फरमान दिया गया था। भय के माहौल के चलते ग्रामीण मंदिर के आसपास जाने से भी बचते थे।
करीब 21 वर्षों तक पूजा बंद रहने के बाद अप्रैल 2024 में परिस्थितियां बदलीं। सुरक्षा बलों की मौजूदगी और ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर की सफाई कराई गई और मंदिर के कपाट दोबारा खोले गए। इसके बाद यहां फिर पूजा-अर्चना शुरू हुई।
केरलापेंदा की यह कहानी बस्तर में बदलती परिस्थितियों का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आई। वर्ष 2025 में यहां से 9 सहित कुल 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद केरलापेंदा को माओवादी मुक्त गांव घोषित किए जाने की जानकारी भी इंफ्लुएंसर्स को दी गई।
पूवर्ती में हिड़मा के परिवार से आमने-सामने संवाद
इसके बाद दल का सफर पूवर्ती की ओर शुरू हुआ। जंगलों और दूरस्थ इलाकों से गुजरते हुए कई घंटे की यात्रा के बाद इंफ्लुएंसर्स देर रात पूवर्ती पहुंचे।
पूवर्ती नक्सली कमांडर हिड़मा का पैतृक गांव है। यहां इंफ्लुएंसर्स ने हिड़मा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से बातचीत की। उन्होंने गांव की मौजूदा परिस्थितियों, स्थानीय जीवन और क्षेत्र में आए बदलावों के बारे में जानकारी ली।
यह मुलाकात पूरे दौरे का सबसे संवेदनशील पड़ाव रही। जिस नाम की पहचान देश में नक्सल हिंसा से जुड़ी रही, उसी व्यक्ति के पैतृक गांव में उसके परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर स्थानीय परिस्थितियों को समझना इंफ्लुएंसर्स के लिए बस्तर की जटिल सामाजिक वास्तविकताओं को करीब से जानने का अनुभव रहा।
अतीत की छाया से बदलाव की ओर बढ़ता बस्तर
दिल्ली से आए इंफ्लुएंसर्स का यह दौरा बस्तर के उन इलाकों तक पहुंचा, जहां कभी भय, हिंसा और सुरक्षा चुनौतियां चर्चा का केंद्र हुआ करती थीं। पूर्व नक्सलियों से संवाद, पुलिस और प्रशासन से जानकारी, ग्रामीणों से मुलाकात, वर्षों से बंद मंदिर का दोबारा खुलना और पूवर्ती में स्थानीय परिवार से बातचीत—इन सभी पड़ावों ने बस्तर के अतीत और वर्तमान के बीच बदलाव की एक तस्वीर सामने रखी।
इस यात्रा ने यह समझने का अवसर दिया कि बस्तर की कहानी केवल उसके हिंसक अतीत तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान में यहां सुरक्षा, संवाद, प्रशासनिक पहुंच और विकास से जुड़े बदलावों को भी करीब से देखा जा सकता है।